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नेपाल की बाढ़ और धराली आपदा में क्या समानता? हिमालय क्षेत्र में बढ़ता खतरा


 नेपाल की बाढ़ और धराली आपदा में क्या है समानता? हिमालय में बढ़ते खतरे ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली: हिमालयी क्षेत्र एक बार फिर बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के कारण चर्चा में है। नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड और उत्तराखंड के धराली में हुई भीषण आपदा भले ही अलग-अलग घटनाएं हों, लेकिन दोनों घटनाएं हिमालय में तेजी से बदल रहे प्राकृतिक खतरों की ओर इशारा करती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों में बदलाव, अत्यधिक बारिश, अस्थिर पहाड़ी ढलान और अचानक मलबे के साथ आने वाला पानी अब हिमालयी क्षेत्रों के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।

नेपाल में आखिर क्या हुआ?

हालिया नेपाल आपदा में शुरुआती तौर पर भूकंप को लेकर अटकलें लगाई गई थीं, लेकिन बाद की वैज्ञानिक जांच में ग्लेशियर के ढहने और उसके साथ बड़े पैमाने पर चट्टान व बर्फ के नीचे आने की प्रक्रिया को प्रमुख कारण माना गया। इससे मलबा नदी तंत्र में पहुंचा और देखते ही देखते नीचे के इलाकों में बेहद तेज बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई। 

यही इसकी सबसे खतरनाक बात थी—आपदा का स्रोत ऊंचाई वाले इलाके में था, लेकिन उसका असर काफी नीचे तक नदी घाटियों और बस्तियों में पहुंच गया।

धराली में भी अचानक आया था तबाही का सैलाब

उत्तराखंड के धराली में हुई आपदा ने भी यह दिखाया कि हिमालय में किसी ऊपरी क्षेत्र में होने वाली घटना किस तरह नीचे बसे इलाकों के लिए अचानक विनाशकारी बन सकती है।

धराली की घटना को लेकर शुरुआती रिपोर्टों में क्लाउडबर्स्ट की चर्चा हुई थी, लेकिन बाद के वैज्ञानिक विश्लेषणों में इस तरह की घटनाओं के पीछे ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में अत्यधिक बारिश, मलबे का बहाव और पहाड़ी अस्थिरता जैसे कई संभावित कारकों पर ध्यान दिया गया।

दोनों घटनाओं में सबसे बड़ी समानता क्या?

इन दोनों आपदाओं की तुलना करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पानी अकेला खतरा नहीं है।

पहाड़ों से जब पानी के साथ बर्फ, चट्टान, मिट्टी और भारी मलबा नीचे की ओर तेजी से आता है, तो उसका असर सामान्य बाढ़ से कहीं ज्यादा विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञ इसे बदलते हिमालयी जोखिमों के व्यापक पैटर्न का हिस्सा मान रहे हैं।

तेजी से बदल रहा हिमालयी पर्यावरण

ग्लेशियरों के पीछे हटने और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से पहाड़ों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। कमजोर होती बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट के कारण चट्टानों और बर्फ के बड़े हिस्से के खिसकने का जोखिम बढ़ सकता है।

2. बारिश का बदलता पैटर्न

हिमालय में मौसम का पैटर्न भी बदल रहा है। कुछ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जहां पहले बर्फबारी अधिक सामान्य थी, वहां बारिश की घटनाओं में बदलाव देखा जा रहा है। अत्यधिक बारिश और तेजी से पिघलती बर्फ मिलकर अचानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ा सकती है। 

कुछ मिनटों में बदल सकती है स्थिति

पहाड़ी इलाकों में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आपदा कई बार उस स्थान से शुरू होती है जहां आबादी बहुत कम होती है। लेकिन नदी घाटी में पहुंचते-पहुंचते उसका प्रभाव बेहद बड़ा हो जाता है।

इसी कारण सामान्य मौसम पूर्वानुमान के साथ-साथ ग्लेशियर, झीलों, पहाड़ी ढलानों और नदी घाटियों की लगातार निगरानी जरूरी हो गई है।

क्या यह पूरे हिमालय के लिए चेतावनी है?

विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल और धराली जैसी घटनाओं को केवल अलग-अलग स्थानीय आपदाओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। हिमालय में लगातार सामने आ रही बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं और मलबे के अचानक बहाव यह संकेत देते हैं कि आपदा प्रबंधन की पुरानी रणनीतियों को बदलते पर्यावरण के अनुसार अपडेट करने की जरूरत है।

इसके लिए बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, सुरक्षित निर्माण, नदी घाटियों की वैज्ञानिक मैपिंग और स्थानीय स्तर पर त्वरित निकासी योजना बेहद जरूरी मानी जा रही है।

हिमालय का खतरा सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं

हिमालय से निकलने वाली नदियां भारत, नेपाल और अन्य देशों के करोड़ों लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं। इसलिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होने वाली ऐसी घटनाओं का असर सीमाओं से काफी आगे तक पहुंच सकता है।

नेपाल की हालिया त्रासदी और धराली की घटना इसी बड़े सवाल को सामने रखती हैं—क्या हिमालय की बदलती परिस्थितियों के मुकाबले हमारी तैयारी पर्याप्त है?

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