बांस की स्टिक से वर्ल्ड कप तक पहुंची सुनेलिता टोप्पो, राजगांगपुर की बेटी ने दुनिया में रोशन किया ओडिशा का नाम
भुवनेश्वर/सुंदरगढ़: कभी गांव की धूल भरी जमीन पर नंगे पैर बांस की स्टिक से हॉकी की शुरुआत करने वाली ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले की बेटी सुनेलिता टोप्पो आज विश्व कप के मैदान पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उनकी कहानी संघर्ष, मेहनत और सपने को हकीकत में बदलने की ऐसी मिसाल है, जो गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंचने वाले युवाओं को प्रेरणा देती है।
18 अगस्त को हॉकी विश्व कप के मुकाबले में भारत की ओर से खेलते हुए सुनेलिता ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 11वें मिनट में गोल दागकर टीम को शानदार शुरुआत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। खास बात यह है कि वह भारतीय टीम में शामिल ओडिशा की एकमात्र खिलाड़ी हैं।
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किसान परिवार में जन्मी, बांस की स्टिक से शुरू हुआ सफर
सुनेलिता टोप्पो का जन्म 11 अप्रैल 2007 को सुंदरगढ़ जिले के राजगांगपुर ब्लॉक के कुकुड़ा गांव में हुआ। उनका परिवार खेती-किसानी से जुड़ा रहा है। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि महंगा हॉकी उपकरण खरीदा जा सके।
सुनेलिता के पिता सुरेश टोप्पो ने बेटी के खेल के जुनून को देखते हुए उसे हॉकी स्टिक की जगह बांस की एक छड़ी दी। इसी साधारण सी बांस की स्टिक से सुनेलिता ने हॉकी के अपने सपने की पहली सीढ़ी चढ़ी।
नंगे पैर मैदान में अभ्यास करते हुए शुरू हुआ यह सफर आज विश्व कप तक पहुंच चुका है।
किसान मेले में हॉकी देखकर बदली जिंदगी
सुनेलिता के हॉकी करियर की शुरुआत के पीछे उनकी मां नेलिसुनिता की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। एक गांव के किसान मेले में आयोजित हॉकी प्रतियोगिता देखने के दौरान सुनेलिता की नजर मैदान में खेल रही लड़कियों पर पड़ी।
खिलाड़ियों की तेजी और हॉकी स्टिक से गेंद पर नियंत्रण देखकर उनके मन में भी इस खेल को सीखने की इच्छा पैदा हुई। इसके बाद उन्होंने हॉकी को अपना लक्ष्य बना लिया।
गांव के कोच डोमिनिक टोप्पो ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें हॉकी की शुरुआती बारीकियां सिखानी शुरू कीं।
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छोटे कद की वजह से मिली असफलता, लेकिन हौसला नहीं टूटा
सुनेलिता के लिए यह सफर हमेशा आसान नहीं रहा। जब उन्होंने राउरकेला के पानपोष हॉकी हॉस्टल में चयन के लिए प्रयास किया तो छोटे कद के कारण उन्हें निराशा हाथ लगी।
यह असफलता उनके लिए बड़ा झटका थी, लेकिन उन्होंने इसे अपने सपने का अंत नहीं बनने दिया। इसके बजाय सुनेलिता ने और मेहनत की और अपने खेल को लगातार बेहतर बनाने पर ध्यान दिया।
2018 में मिला बड़ा मौका
सुंदरगढ़ के सेंट मेरीज गर्ल्स हाई स्कूल में कक्षा नौ में पढ़ाई के दौरान वर्ष 2018 में सुनेलिता का चयन जिले के Sports Authority of India (SAI) प्रशिक्षण केंद्र के लिए हुआ।
कोच पीके सारंगी के मार्गदर्शन में उनके खेल में लगातार निखार आया। इसके बाद उन्होंने भुवनेश्वर स्थित Odisha Naval Tata Hockey High Performance Centre में प्रशिक्षण लिया।
नेशनल गेम्स से राष्ट्रीय टीम तक
वर्ष 2022 में गुजरात में आयोजित नेशनल गेम्स में सुनेलिता के प्रदर्शन ने उन्हें नई पहचान दिलाई। इसके बाद उनका चयन बेंगलुरु स्थित Centre of Excellence के लिए हुआ।
महज 16 वर्ष की उम्र में वर्ष 2023 में उन्हें भारतीय सीनियर टीम के राष्ट्रीय कैंप में बुलाया गया। यह उनके करियर में एक बड़ा पड़ाव था।
जूनियर एशिया कप में भारत को दिलाई सफलता
सुनेलिता ने वर्ष 2023 में जापान में आयोजित Junior Asia Cup में भारत की विजेता टीम का हिस्सा बनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। इसके बाद उन्होंने जूनियर विश्व कप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया।
लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद वर्ष 2024 में उन्होंने सीनियर भारतीय टीम में अपनी जगह बनाई।
मिडफील्ड से फॉरवर्ड तक बदली भूमिका
सुनेलिता ने अपने हॉकी करियर की शुरुआत मिडफील्डर के तौर पर की थी। लेकिन कोचों ने उनकी तेज रफ्तार, तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता और डिफेंस को चीरकर आगे निकलने की योग्यता को देखते हुए उन्हें आगे की पोजीशन पर खेलने का मौका दिया।
फॉरवर्ड के रूप में उनकी गति और आक्रामक खेल भारत के लिए काफी उपयोगी साबित हो रहा है।
कुकुड़ा गांव से विश्व कप तक
आज जब सुनेलिता विश्व कप के मैदान पर भारतीय जर्सी पहनकर उतरती हैं, तो उनके साथ सिर्फ उनका परिवार या उनका गांव नहीं, बल्कि पूरा सुंदरगढ़ और ओडिशा जुड़ा हुआ महसूस करता है।
जिस लड़की ने कभी महंगी हॉकी स्टिक के अभाव में बांस की छड़ी से अभ्यास शुरू किया था, वही आज दुनिया के सबसे बड़े हॉकी मंचों में से एक पर भारत के लिए गोल कर रही है।
सुनेलिता टोप्पो की कहानी बताती है कि साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन अगर लक्ष्य बड़ा हो और मेहनत लगातार जारी रहे तो गांव की पगडंडी से निकलकर विश्व मंच तक भी पहुंचा जा सकता है।
सुंदरगढ़ की इस बेटी का सफर आज ओडिशा के उन हजारों युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन चुका है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद खेल के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।



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