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अध्यात्म और प्रकृति का अनूठा संगम: भद्राचलम का दिव्य क्षेत्र 'पर्णशाला'


  आस्था और प्रकृति का पावन संगम: पर्णशाला, जहाँ थमे थे प्रभु श्री राम के चरण

तेलंगाना के भद्राचलम क्षेत्र में स्थित 'पर्णशाला' सिर्फ एक स्थान नहीं, बल्कि त्रेतायुग के इतिहास का एक जीवंत पन्ना है। गोदावरी नदी के पावन तट पर बसे इस अलौकिक गाँव का कण-कण रामायण महाकाव्य की स्मृतियों को खुद में समेटे हुए है। मान्यता है कि चौदह वर्ष के वनवास के दौरान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण ने इसी पावन भूमि पर अपने रहने के लिए पत्तों की कुटिया यानी 'पर्णशाला' बनाई थी।
​नाम का रहस्य: संस्कृत में 'पर्ण' का अर्थ पत्ता और 'शाला' का अर्थ घर होता है। चारों तरफ घने और हरे-भरे पेड़ों से घिरे होने के कारण ही इस दिव्य स्थान का नाम 'पर्णशाला' पड़ा।

यदि आप भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर, अध्यात्म के सागर में डूबना चाहते हैं और साथ ही प्रकृति की गोद का आनंद लेना चाहते हैं, तो तेलंगाना का यह 'पर्णशाला' गाँव आपका स्वागत करने के लिए तैयार है। यहाँ की यात्रा आपको त्रेतायुग की दिव्यता और आज के प्राकृतिक सौंदर्य से एक साथ सराबोर कर देगी।

​जय श्री राम! 🙏


 ​विशेष रिपोर्ट: रमाशंकर श्रीवास्तव

कैमरामैन: विष्णु भास्कर के साथ

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